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    Home»imran»देवी अथर्वशीर्ष – हिंदी लिरिक्स
    imran

    देवी अथर्वशीर्ष – हिंदी लिरिक्स

    Ranveer KumarBy Ranveer KumarJuly 16, 2023No Comments11 Mins Read
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    देवीअथर्व शीर्षम
    M:-    भक्त जनो एक बार की बात है सभी देवता देवी माँ के पास गए बड़े विनम्र भाव से पूछने लगे हे महादेवी आप कौन है ! प्रेमीजनों अथर्व वेद में देवी अथर्वशीर्ष की बड़ी महिमा बताई गई है इसके पाठ से देवी की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है यदपि सप्तसती पाठ का अंग बना कर इसका अन्यत्र कही उल्लेख नहीं हुआ है तथापि सप्तसती स्त्रोत आरम्भ करने से पूर्व इसका पाठ कर लिया जाए तो बहुत बड़ा लाभ हो सकता है! इस उद्देश्य से हम रात्रि सुप्त के बाद इसका समावेश करते है आशा है जगदम्बा के उपासक इससे जरूर संतुष्ट होंगे ! आइए जगत जननी नौ दुर्गा के श्री चरणों में प्रणाम करते हुए माता का ध्यान करिए और देवी अथर्व शीर्ष का पाठ श्रवण कीजिए !
    ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थु : कसि त्वं महादेविता 
    साब्रवीत् अहम् ब्रह्मस्वरुपानी 
    मत : प्रकृतिपुरुषातमकं जागत् ! च शून्यं चशून्यं च !!
    अहमानन्दानन्दौ ! अहम विज्ञानविज्ञाने ! अहं ब्रह्मब्रह्माणि वेदित्वये ! अहं पञ्चभतान्य पञ्चभूतानि  अहम् खिलं जगत!!
    भक्तजनो देवताओं द्वारा पूछे गए प्रश्न की महादेवी आप कौन है ! इसके उतर में माँ कहती है मै ब्रह्मस्वरूपा हूँ मुझसे प्रकृति पुरुषात्मक सुदरूप और असद्रूप जगत उत्पन हुआ है मै आनन्द और आनंद रूपा हूँ मै विज्ञान और अविज्ञान रूपा हूँ अवश्य जानने योगय ब्रह्म और अब्रह्म भी मै ही हूँ पंचीकृत और अपंचीकृत महाभूत भी मै ही हूँ यह सारा दृश्य जगत मै ही  हूँ वेद और आवेद मै ही हूँ विद्या और अविद्या मै ही हूँ अजा और अन्जा प्रकृति और उससे भिन्न भी मै ही हूँ नीचे ऊपर अगल बगल भी मै ही  हूँ!
    वेदोहम वेदोहम्  ! अजाहमनाजहम् !! अधशोर्ध्म च तिर्यकचाहम !
    अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि । अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि । अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ 
    अहं सोमं तवष्टारं पूषणं भगं दधामि । अहं विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि
    मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में संचार करती हूँ, मैं आदित्यों और विश्वेदेवों के रूपों में फिरा करती हूँ। मैं मित्र और वरुण दोनों का, इंद्र, अग्नि एवं दोनों अश्विनीकुमारों का भरण पोषण करती हूँ।
    मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ। त्रैलोक्य को आक्रान्त करने के लिए विस्तीर्ण पादक्षेप करने वाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापति को मैं ही धारण करती हूँ।
    अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते । अहं राष्ट्री सङ्ग्मनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । य एवं वेद । स दैवीं संपदमाप्नोति
    ते देवा अब्रुवन्- नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
    नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।
    तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफ़लेषु जुष्टाम् ।
    दुर्गां देवीं शरणं प्रपद्यामहेसुरान्नायित्र्यै ते नमः ।
    देवीं वाचमजनयन्त  देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति ।
    सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ।
    देवों को उत्तम हवि पहुंचाने वाले और सोमरस निकालने वाले यजमान के लिए मैं हविर्द्रव्यों से युक्त धन को धारण करती हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी, उपासकों को धन देने वाली, ब्रह्मरूप और यज्ञार्हों में  यजन करने योगय देवों मे मुख्य हूँ। मैं आत्मस्वरूप पर आकाश आदि का निर्माण करती हूँ। मेरा स्थान आत्मस्वरूप को धारण करने वाली बुद्धिवृत्ति में है।  जो इस प्रकार जानता है, दैवी संपत्ति लाभ करता है
    तब उन देवों ने कहा- देवी को नमस्कार है। बड़े बड़ों को अपने-अपने कर्तव्य में प्रवृत्त करने वाली कल्याणकत्री को सदा नमस्कार है। गुण साम्यावस्थारूपिणी मंगलमयी देवी को नमस्कार है। नियमयुक्त होकर हम उन्हें प्रणाम करते हैं।
    उन अग्नि के जैसी वर्ण वाली, ज्ञान से जगमगाने वाली, दीप्तिमति, कर्मफल प्राप्ति के हेतु सेवन की जाने वाली दुर्गा देवी की हम शरण में हैं। असुरों का नाश करने वाली देवि ! तुम्हे नमस्कार है।
    प्राणरूप देवों ने जिस प्रकाशवान वैखरी वाणी को उत्पन्न किया, उसे अनेक प्रकार के प्राणी बोलते हैं। वह कामधेनु तुली आनंद दायक और अन्न तथा बल देने वाली वागरूपिणी भगवती उत्तम स्तुति से संतुष्ट होकर हमारे समीप आये
    कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्  ।
    सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ।
    महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि ।
    तन्नो       देवी         प्रचोदयात् ।
    अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव ।
    तां देवा अन्वाजयन्त भद्रा अमृतबन्धवः ।
    काल का भी नाश करने वाली, वेदों द्वारा स्तुत हुई विष्णुशक्ति, स्कंदमाता शिवशक्ति सरस्वती (ब्रह्मशक्ति), देवमाता अदिति और दक्षकन्या (सती), पापनाशिनी कल्याणकारिणी भगवती को हम प्रणाम करते हैं।
    हम महालक्ष्मी को जानते हैं और उन सर्वशक्तिरूपिणी का ही ध्यान करते हैं। वह देवी हमें उस विषय ज्ञान-ध्यानमें प्रवृत्त करें।
    हे दक्ष! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुईं और उनके मृत्युरहित कल्याण मे देव उत्पन्न हुए।
    कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभमिन्द्रः ।
    पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्यैषा विश्वमातादिविद्योम्  ।
    एषाऽऽत्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनी । पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा ।
    एषा श्रीमहाविद्या । य एवं वेद स शोकं तरति ।
    काम (क), योनि (ए), कमला (ई), वज्रपाणि- इंद्र (ल), गुहा (ह्रीं), ह, स- वर्ण, मातरिश्वा- वायु (क), अभ्र (ह), इंद्र (ल), पुनः गुहा (ह्रीं), स, क, ल- वर्ण और माया (ह्रीं)- या सर्वात्मिका जगन्माता की मूलविद्या है और वह ब्रह्मरूपिणी है।14।
    शिव शक्ति भेद रूपा ब्रह्मा विष्णु शिवात्मिका सरस्वती लक्ष्मी गोरीरूपा अशुद्ध मिश्र शुद्धो पासनात्मिका समर सी भूत शिव सत्यात्मक ब्रह्म स्वरूपका निर विकल्प ज्ञान देने वाली सर्वतत्वात्मिका महात्रिपुर सुंदरी यही इस मन्त्र का भावार्थ है ! यह मन्त्र सब मंत्रो  का मुकट मणि है और मन्त्र शास्त्र में पंचदसी आदि श्री विद्या के नाम से प्रसिद्ध है ! इसके छ: प्रकार के अर्थ अर्थात भावार्थ वाच्यार्थ सम्प्र्दायार्थ लोकीकार्थ रहस्यार्थ और तत्वार्थ नित्य षोडशीकरणव ग्रन्थ में बताये गए हैं ! इसी प्रकार वरिवस्या रहस्य आदि और भी गारंटी में इसके अनेक अर्थ दिखाये गए हैं ! श्रुति में भी ये मन्त्र इस प्रकार अर्थात कवचित स्वरूपों चार कवचित लक्षण और लक्षित लक्षण से और कही वर्ण के पृथक पृथक अव्यय दर्शाकर जानबूझकर क्रू श्रृंखल स्वरुप कहै गए हैं इससे यह मालूम होगा की यह मन्त्र और महत्वपूर्ण है!
    ये परमात्मा की शक्ति हैं। ये विश्वमोहिनी हैं। पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करने वाली हैं। ये श्री महाविद्या हैं। जो ऐसा जानता है, वह शोक को पार आकर जाता है।
    नमस्ते अस्तु भगवति मातरस्मान् पाहि सर्वतः ।
    भगवती! तुम्हे नमस्कार है। माता! सब प्रकार से हमारी रक्षा करो।
    सैपाष्टा वसवः  सैषैकादश रुद्राः  सैषा द्वादशादित्याः ।
    सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च ।
    सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः ।
    सैषा सत्त्रजस्तमान्सि  सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररुपिणी ।
    सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि ।
    कलाकाष्ठादिकालरूपिणी । तामहं प्रणौमि नित्यम् ।
    पपापहारिणीं देवीं भक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् ।
    अनन्तां विजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम् ।
    भक्त जानो मंत्रदृष्टा ऋषि कहते हैं
    वही ये अष्ट वासु हैं, वही ये एकादश रूद्र हैं, वही ये द्वादश आदित्य हैं, वही ये सोमपान करने वाले और सोमपान न करने वाले विश्वेदेव हैं, वही ये यातुधान (एक प्रकार के राक्षस), असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं, वही ये सत्त्व-रज और ताम हैं, वही ये ब्रह्म, विष्णु, रुद्ररूपिणी हैं, वही ये प्रजापति-इंद्र-मनु हैं, वही ये ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं, वही कला-काष्ठादि कालरूपिणी हैं, उन पाप नाश करने वाली, भोग-मोक्ष देने वाली , अंतरहित, विजयाधिष्ठात्री, निर्दोष शरण लेने योग्य, कल्याणदात्री और मंगल रूपिणी देवी को हम सदा प्रणाम करते हैं।
    वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम्।
    अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ।
    एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्धचेतसः ।
    ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः
    वियत- आकाश (ह) तथा ‘ई’ कार से युक्त, वीतिहोत्र- अग्नि (र)- सहित, अर्धचंद्र से अलंकृत जो देवी का बीज है, वह सब मनोरथ पूर्ण करने वाला है। इस प्रकार एकाक्षर ब्रह्म (ह्रीं)- का ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त का शुद्ध है, जो निरातिशयानन्दपूर्ण और ज्ञान के सागर हैं। यह मन्त्र देवी का प्रणव माना जाता है। ॐकार के सामान यह मन्त्र भी व्यापक अर्थ से भरा हुआ है। संक्षेप में इसका अर्थ इच्छा ज्ञान क्रियाधार अद्वैत अखंड सच्चिदानंद समर सी भूत शिव शक्ति स्मरण है!
    वाङ्माया ब्रह्मसूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् ।
    सूर्योऽवामश्रोत्रबिन्दुसन्युक्तष्टात्तृतीयकः ।
    नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः ।
    विच्चे नवार्णकोर्णः स्यान्महदानन्ददायकः
    वाणी (ऐं), माया (ह्रीं), ब्रह्मसू- काम (क्लीं), इसके आगे छठा भोजन अर्थात च, वही वक्त्र अर्थात आकार से युक्त (चा), सूर्य (म), ‘अवाम श्रोत्र’- दक्षिण कर्ण (उ) और बिंदु अर्थात अनुस्वार से युक्त (मुं), टकार से तीसरा ड, वही नारायण अर्थात ‘आ’ से मिश्र (डा), वायु (य), वही अधर अर्थात ‘ऐ’ से युक्त (यै)और ‘विच्चे’ यह नवार्ण मन्त्र उपासकों को आनंद और ब्रह्म सायुज्य देने वाला है।
    ह्रित्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् ।
    पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् ।
    त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ।
    नमामि त्वां महादेवीं महाभयविनाशिनीम् ।
    महादुर्गप्रशमनीं महाकारुन्यरूपिणीम् ।
    यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया ।
    यस्या अन्तो न लभ्यते तस्मादुच्यते अनन्ता ।
    यस्या लक्ष्यं नोपलभ्यते तस्मादुच्यते अलक्ष्या ।
    यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादुच्यते अजा ।
    एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका ।
    एकैव विश्वरूपिणी तस्मादुच्यते नैका ।
    अत एवोच्यते अज्ञेयानन्तालक्ष्याजैका नैकेति ।
    इस मन्त्र का अर्थ -हे चित्स्वरुपिणी महासरस्वती! हे सद रूपिणी महालक्ष्मी! हे आनंद रूपिणी महाकाली! ब्रह्मविद्या पाने के लिए हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती स्वरूपिणी चण्डिके! तुम्हे नमस्कार है। अविद्या रूप रज्जू की दृढ ग्रंथि को खोलकर मुझे मुक्त करो
    हृतकमल के मध्य में रहने वाली, प्रातःकालीन सूर्य के समान प्रभा वाली, पाश और अंकुश धारण करने वाली, मनोहर रूपवाली, वरद और अभयमुद्रा धारण किये हाथों वाली, तीन नेत्रों से युक्त, रक्तवस्त्र परिधान करने वाली और कामधेनु के समान भक्तों के मनोरथ पूर्ण करने वाली देवी को मैं भजता हूँ !
    महाभय का नाश करने वाली, महासंकट को शांत करने वाली और महान करुना की साक्षात मूर्ति तुम महादेवी को मैं नमस्कार करता हूँ।
    जिसका स्वरुप ब्रह्मादिक नहीं जानते- इसलिए जिसे अज्ञेया कहते हैं, जिसका अंत नहीं मिलता- इसीलिए जिसे अनंता कहते हैं, जिसका लक्ष्य दिखाई नहीं पड़ता- इसीलिए जिसे अलक्ष्या कहते हैं, जिनका जन्म समझ में नहीं आता- इसीलिए जिसे अजा कहते हैं, जो अकेली ही सर्वत्र है- इसीलिए जिसे एका कहते हैं, जो अकेली ही विश्वरूप में सजी हुई है- इसीलिए जैसे नैका कहते हैं, वह इसीलिए अज्ञेया, अनंता, अलक्ष्या, अजा, एका, नैका कहाती हैं ! माता आपको हम प्रणाम करते हैं! 
    मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी ।
    ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ।
    यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ।
    तां दुर्गा दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम् ।
    नमामि भवभीतोहं संसारार्णवतारिणीम् ।
     इदमर्थर्वशीर्षं योधीते स पन्चाथर्वशीर्षजपफलमाप्नोति।
    इदमथर्वशीर्षमज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति-शतलक्षं प्रजप्त्वापि सोर्चासिद्धिं न विन्दति।
    शतमष्टोत्तरं चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः।
    दशवारं पठेद् यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते ।
    महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः ।
    सब मन्त्रों में ‘मातृका’- मूलाक्षर रूप से रहने वाली, शब्दों में ज्ञान (अर्थ)- रूप से रहने वाली, ज्ञानों में ‘चिन्मयातीता’, शून्यों में ‘शून्यसाक्षिणी’ तथा जिनसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, वे दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं।
    उन दुर्विज्ञेय, दुराचार नाशक और संसार सागर से तारने वाली दुर्गा देवी को संसार से डरा हुआ मैं नमस्कार करता हूँ ! 
    भक्तजनो इस अथर्वशीर्ष का जो अध्ययन करता है, उसे पाँचों अथर्शीर्षों के जप का फल प्राप्त होता है। इस अथर्वशीर्ष को न जानकार जो प्रतिमा स्थापन करता है, वह सैकड़ों लाख जप करके भी अर्चासिद्धि नहीं प्राप्त करता। अष्टोत्तर(108 बार) जप इत्यादि इसकी पुरश्चरण विधि है। जो इसका दस बार पाठ करता है वह उसी क्षण पापों से मुक्त हो जाता है और महादेवी के प्रसाद से बड़े दुस्तर संकटों को पार कर जाता है।
    सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाश्यति । प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाश्यति ।
    सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति । निशीथे तुरीय संध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति।
    नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध्यं भवति ।
    प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति ।
    भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति ।
    स महामृत्युं तरति य एवं वेद । इत्युपनिषत् 
    इति देवी अथर्वशीर्षम सम्पूर्णम
    भक्तजनो इस देवी अथर्वशीर्ष का सायंकाल में अध्ययन करने वाला दिन में किये हुए पापों का नाश करता है, प्रातः काल में अध्ययन करने वाला रात्री में किये हुए पापों का नाश करता है। दोनों समय अध्ययन करने वाला निष्पाप होता है। मध्यरात्रि में तुरीय  श्री विद्या की उपसना के लिए चार संध्या ये आवश्यक हैं  इनमे तुरिय संध्या मध्य रात्रि में होती है ! तुरिय संध्या के समय जप करने से वाकसिद्धि प्राप्त होती है। नयी प्रतिमा पर जप करने से देवता सान्निध्य प्राप्त होता है। प्राणप्रतिष्ठा के समय जप करने से प्राणों की प्रतिष्ठा होती है। भौमाश्विनी (अमृतसिद्धि) योग में महादेवी की सन्निधि में जप करने से महामृत्यु से तर जाता है।  जो इस प्रकार जानता है, वह महामृत्यु से तर जाता है। इस प्रकार यह अविद्यानाशिनी ब्रह्मविद्या है।।
    इति देवी अथर्वशीर्षम सम्पूर्णम !
    भक्तजनो श्री दुर्गा सप्तसती में यह देव अथर्व शीर्ष जिस प्रकार वर्णित है उसी का हमने पाठ किया और जो व्याख्या इसमें दी गयी है ! उसी को पढ़ के आपको सुना दिया ! महादेवी आप सब का कल्याण करें इस पठन में मुझसे कोई त्रुटि हुई हो तो माता अपना बालक समझ कर मुझ पर कृपा करें मुझे क्षमा करें मुझे अभय दान दे !
    ॐ श्री दुर्गा देविये नमः 

    Singer – Prem Prakash Dubey

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    Ranveer Kumar

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